लिविंग विल: 60+ उम्र के लोगों के लिए क्यों जरूरी है यह कानूनी दस्तावेज?
बढ़ती उम्र के साथ गंभीर बीमारियों और अचानक होने वाली स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति स्वयं अपनी चिकित्सा संबंधी इच्छा बताने की स्थिति में न हो, तो ‘लिविंग विल’ (Living Will) उसकी पहले से व्यक्त इच्छा को सामने रखने वाला महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेज बन सकता है।
लिविंग विल को सामान्य वसीयत से अलग समझना जरूरी है। यह संपत्ति के बंटवारे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी की स्थिति में चिकित्सा उपचार और जीवन-रक्षक उपायों के संबंध में व्यक्ति की इच्छा पहले से दर्ज करने के लिए बनाई जाती है।
1. अपनी चिकित्सा इच्छा पहले से दर्ज कर सकते हैं
यदि किसी व्यक्ति की हालत ऐसी हो जाए कि वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम न हो—जैसे कोमा, डिमेंशिया या गंभीर स्ट्रोक की स्थिति—तो लिविंग विल के माध्यम से वह पहले से अपनी चिकित्सा संबंधी इच्छाएं दर्ज कर सकता है।
इसमें यह स्पष्ट किया जा सकता है कि विशेष गंभीर परिस्थितियों में व्यक्ति किस प्रकार का उपचार चाहता है या किन जीवन-रक्षक चिकित्सा उपायों के संबंध में उसकी क्या इच्छा है।
इससे परिवार को अंतिम समय में मरीज की इच्छा समझने में मदद मिल सकती है।
2. डिमेंशिया या अल्जाइमर जैसी स्थिति में विशेष महत्व
डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों में समय के साथ व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में पहले से बनाई गई लिविंग विल व्यक्ति की उस समय की इच्छा को रिकॉर्ड पर रखने में सहायक हो सकती है, जब वह स्वयं अपनी चिकित्सा संबंधी पसंद स्पष्ट करने की स्थिति में न हो।
इसलिए स्वस्थ अवस्था में अपनी इच्छाओं को समझकर और उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें दर्ज करना महत्वपूर्ण है।
3. भरोसेमंद व्यक्ति को नामित किया जा सकता है
लिविंग विल में व्यक्ति किसी विश्वसनीय व्यक्ति को नामित कर सकता है, जो आवश्यकता पड़ने पर उसकी पहले से व्यक्त चिकित्सा इच्छाओं को डॉक्टर और परिवार के सामने रखने में सहायता कर सके।
यह व्यक्ति परिवार का सदस्य या कोई अन्य भरोसेमंद व्यक्ति हो सकता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीज की पहले से व्यक्त इच्छा गंभीर चिकित्सा परिस्थिति में सामने रखी जा सके।
4. इमरजेंसी में मेडिकल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण
लिविंग विल का एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू यह है कि व्यक्ति की चिकित्सा संबंधी इच्छाओं का रिकॉर्ड पहले से उपलब्ध रहे।
यदि व्यक्ति किसी आपात स्थिति में स्वयं अपनी बात बताने में सक्षम नहीं है, तो परिवार और चिकित्सकों के सामने उसकी पहले से दर्ज इच्छा मौजूद हो सकती है।
हालांकि, केवल परिवार की इच्छा के आधार पर चिकित्सा निर्णय नहीं किए जा सकते। लागू कानूनी प्रक्रिया और चिकित्सकीय व्यवस्था का पालन भी आवश्यक होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है महत्व
भारत में लिविंग विल/एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव का कानूनी आधार महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों से विकसित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में Common Cause मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु और एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव से संबंधित महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए थे।
इसके बाद इस विषय से संबंधित प्रक्रिया और कानूनी व्यवस्था में भी विकास हुआ है।
60+ उम्र में क्यों करें विचार?
लिविंग विल बनाने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति उपचार से इनकार कर रहा है। इसका मूल उद्देश्य यह है कि व्यक्ति की चिकित्सा संबंधी इच्छा उस समय भी सम्मानित हो सके, जब वह स्वयं बोलने या निर्णय लेने की स्थिति में न हो।
इसलिए 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के साथ-साथ गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए भी यह विषय परिवार के साथ चर्चा करने योग्य है।
महत्वपूर्ण: लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है और इसे लागू करने के लिए निर्धारित कानूनी एवं चिकित्सकीय प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। इसे तैयार करने से पहले योग्य वकील और चिकित्सकीय विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।